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अमेरिका की दादागिरी का जवाब: क्या अब भारत-रूस-चीन को मिलकर रणनीतिक पहल करनी चाहिए?

आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ   एकध्रुवीय व्यवस्था  (Unipolar World Order) पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। लंबे समय ...

आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ एकध्रुवीय व्यवस्था (Unipolar World Order) पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। लंबे समय तक अमेरिका ने स्वयं को विश्व का प्रहरीमानते हुए आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य हस्तक्षेप, राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के दुरुपयोग के माध्यम से अनेक देशों पर अपनी नीतियाँ थोपने का प्रयास किया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका की इस दादागिरी का जवाब अब भारत, रूस और चीन को मिलकर देना चाहिए?


अमेरिका की दादागिरी: एक संक्षिप्त विश्लेषण

अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास देखें तो इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, ईरान, वेनेज़ुएला और हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन संघर्ष में उसकी भूमिका विवादों से भरी रही है।

  • आर्थिक प्रतिबंध को हथियार बनाकर देशों की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना
  • डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय प्रणाली के जरिए दबाव बनाना
  • NATO और अन्य सैन्य गठबंधनों के माध्यम से सैन्य प्रभुत्व बनाए रखना

इन नीतियों ने कई देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या अमेरिका वास्तव में लोकतंत्र और मानवाधिकारों का रक्षक है, या फिर केवल अपने हितों की रक्षा करने वाली महाशक्ति।


भारत-रूस-चीन (IRC) की सामूहिक ताकत

भारत, रूस और चीन ये तीनों देश मिलकर दुनिया की लगभग 40% आबादी, विशाल प्राकृतिक संसाधन, मजबूत सैन्य क्षमता और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • रूस: ऊर्जा संसाधनों और सैन्य शक्ति में अग्रणी
  • चीन: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक महाशक्ति
  • भारत: युवा जनसंख्या, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक कूटनीतिक स्वीकार्यता

BRICS, SCO और G20 जैसे मंच पहले से ही इस सहयोग की बुनियाद को मजबूत कर रहे हैं।


क्या तीनों देशों को मिलकर जवाब देना चाहिए?

इस प्रश्न का उत्तर हाँ और नहीं दोनों में छिपा है।

हाँ, इसलिए क्योंकि:

  • एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) का निर्माण आवश्यक है
  • डॉलर पर निर्भरता कम कर वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था विकसित की जा सकती है
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज मजबूत हो सकती है

नहीं, इसलिए क्योंकि:

  • भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास मौजूद है
  • तीनों देशों के राष्ट्रीय हित हर मुद्दे पर समान नहीं हैं
  • भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति (Strategic Autonomy) से समझौता नहीं कर सकता

भारत की भूमिका: संतुलन और नेतृत्व

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय संतुलनकारी शक्ति (Balancing Power) की भूमिका निभाए।
भारत न तो अमेरिकी दबाव में आना चाहता है और न ही किसी नए शक्ति गुट का अंध समर्थक बनना।
वसुधैव कुटुम्बकम्की भावना के साथ भारत शांति, संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देता है।


निष्कर्ष

अमेरिका की दादागिरी का जवाब सीधे टकराव से नहीं, बल्कि सामूहिक कूटनीति, आर्थिक सहयोग और वैकल्पिक वैश्विक ढाँचे के निर्माण से दिया जाना चाहिए।
भारत, रूस और चीन का सहयोग जरूरी है, लेकिन वह सहयोग लचीला, मुद्दा-आधारित और आपसी सम्मान पर आधारित होना चाहिए।

आज दुनिया को किसी नई महाशक्ति की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, संतुलित और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता है और इसमें भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है।